POKE चुनावों पर पश्चिमी देशों के रवैये पर उठे सवाल
Indianewslive247.com – प ओक च न व क ल – पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र में हुए विधानसभा चुनावों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, धांधली के आरोप, मतदाताओं को डराने की घटनाएं और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी जैसे मुद्दे सामने आए, फिर भी पश्चिमी राष्ट्रों की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत शांत रही। इन POKE चुनावों में विपक्षी दलों ने पाकिस्तानी अधिकारियों पर प्रक्रिया में हस्तक्षेप का आरोप लगाया था।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि यह केवल एक बार हुआ मामला नहीं है, बल्कि आरोपों का एक दोहराया जाने वाला क्रम है। इससे कई मतदाताओं को लगता है कि मतदान शुरू होने से पहले ही परिणाम निर्धारित कर लिए जाते हैं।
पाकिस्तान के लिए रणनीतिक छूट का इतिहास
दक्षिण एशिया के अन्य राष्ट्रों में चुनावी अनियमितताओं पर पश्चिमी देश अक्सर स्पष्ट प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन पाकिस्तान के मामले में दशकों से अलग व्यवहार देखा गया है। इटली के राजनीतिक सलाहकार और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने टाइम्स ऑफ इस्राइल में प्रकाशित अपने लेख में इस बात पर प्रकाश डाला।
इसका परिणाम यह होता है कि पाकिस्तान को जवाबदेही से एक तरह की रणनीतिक छूट मिल जाती है। समय के साथ यह छूट एक आदत बन जाती है।
शीत युद्ध के दौर में भी पाकिस्तान के साथ इसी प्रकार का व्यवहार हुआ। 11 सितंबर के हमलों के बाद आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान की रणनीतिक भूमिका के कारण लोकतांत्रिक जवाबदेही का मुद्दा पीछे चला गया।
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ता दबाव
रेस्टेली ने दावा किया कि वर्तमान पाकिस्तान भी उसी ढांचे में फिट बैठता है। उन्होंने लिखा कि इमरान खान जेल में हैं और अदालतें अपने फैसलों को लेकर पहले से अधिक सतर्क हो गई हैं। पिछले चुनावों के बाद मीडिया का दायरा सिमटा है और राजनीतिक विपक्ष पुलिस के दबाव में काम कर रहा है।
ऐसे माहौल में POKE में विवादित चुनाव कोई असामान्य घटना नहीं, बल्कि उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।
चुनावी वैधता पर उठते प्रश्न
POKE में राजनीतिक वैधता कमजोर होने से इस्लामाबाद के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दावा करना और कठिन हो जाता है कि कश्मीर मुद्दे पर उसका पक्ष लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर आधारित है। स्थानीय स्तर पर चुनावी अनियमितताओं की वैश्विक स्तर पर भी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
पश्चिमी देशों की चुप्पी क्यों खतरनाक है?
पश्चिमी नीति-निर्माताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि जिस साझेदारी को बनाए रखने के लिए चुनावी धांधली पर आंखें मूंदनी पड़ें, वह दीर्घकाल में मजबूत नहीं हो सकती।
सुरक्षा सहयोग और लोकतांत्रिक जवाबदेही तब एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, जब साझेदार देश इसके लिए तैयार हो। लेकिन यदि ऐसा नहीं है, तो दोनों के बीच टकराव पैदा होता है।
अगर चुनावी धांधली पर प्रतिक्रिया कमजोर रहती है, तो इससे यह संदेश जाता है कि नियम केवल वहीं लागू होते हैं, जहां बड़ी शक्तियों के हित जुड़े हों। इससे उन देशों में पश्चिम की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, जहां पहले से ही उसके प्रति संदेह मौजूद है।

