International Study: यमुना डूब क्षेत्र – दिल्ली का प्राकृतिक वाटर प्यूरीफायर
Indianewslive247.com – एक नवीनतम International Study ने यह पुष्टि की है कि यमुना नदी का पुराना डूब क्षेत्र (फ्लड प्लेन) दिल्ली को उपलब्ध पेयजल को स्वतः साफ करने में निर्णायक योगदान देता है। जब नदी का जल भूमिगत रेत, गाद, मिट्टी और बजरी की परतों से होकर गुजरता है, तो उसमें मौजूद हानिकारक रसायन एवं सूक्ष्म प्रदूषक महत्वपूर्ण रूप से कम हो जाते हैं। इस प्रक्रिया से जल की गुणवत्ता में सुधार होता है और उसे पीने के लिए उपयोग करने की प्रक्रिया अधिक सफल बनती है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग से हुआ शोध
इस महत्वपूर्ण International Study में आईआईटी रुड़की, डॉ. विश्वनाथ कराड एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी, अमेरिका की ऑबर्न यूनिवर्सिटी, मेक्सिको की टेक्नोलॉजिको डी मॉन्टेरी और चीन की तियानफू योंगक्सिंग लैबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से भाग लिया। शोधकर्ताओं ने 13 महीनों की अवधि में मानसून और गैर-मानसून दोनों ऋतुओं में यमुना नदी तथा उसके तट पर स्थित आठ रैनी कुओं से जल के नमूने एकत्र किए।
शोधकर्ताओं के अनुसार, जमीन के भीतर मौजूद सूक्ष्मजीव भी इन हानिकारक तत्वों को विघटित करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
प्रदूषकों में उल्लेखनीय कमी
जांच के दौरान नदी के जल में 57 प्रकार के ऑर्गेनिक माइक्रोपॉल्यूटेंट की पहचान की गई। इनमें दवाओं के अवशेष, कीटनाशक, प्लास्टिक संबंधी रसायन, कॉस्मेटिक एवं पर्सनल केयर उत्पादों के तत्व, हार्मोन और अस्पतालों के अपशिष्ट से जुड़े घटक शामिल थे। हालांकि, जब यह जल फ्लडप्लेन की प्राकृतिक परतों से होकर रैनी कुओं तक पहुंचा, तो इन प्रदूषकों की मात्रा में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। कई दवाओं और कीटनाशकों के अवशेष लगभग पूरी तरह समाप्त हो गए।
रिवरबैंक फिल्ट्रेशन: प्रकृति का वॉटर फिल्टर
हजारों वर्षों में यमुना ने अपना मार्ग कई बार बदला, जिससे उसके किनारों पर रेत, गाद और मिट्टी की मोटी परतें जमा होती गईं। यही परतें आज प्राकृतिक फिल्टर का कार्य करती हैं। नदी का जल धीरे-धीरे इन परतों से रिस कर रेनी कुओं तक पहुंचता है, जहां से दिल्ली जल बोर्ड शहर के विभिन्न इलाकों में जलापूर्ति करता है। इस प्राकृतिक प्रक्रिया को रिवरबैंक फिल्ट्रेशन कहा जाता है। यह कम लागत वाला, पर्यावरण-अनुकूल और प्रभावी प्री-ट्रीटमेंट सिस्टम है, हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का विकल्प नहीं हो सकता।
फ्लडप्लेन संरक्षण: दिल्ली का जल भविष्य
International Study में चेतावनी दी गई है कि यदि यमुना के फ्लडप्लेन पर अतिक्रमण या बड़े पैमाने पर निर्माण जारी रहा, तो यह प्राकृतिक फिल्ट्रेशन प्रणाली गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। इसका असर भूजल की गुणवत्ता और दिल्ली की दीर्घकालिक जल सुरक्षा पर पड़ेगा। शोधकर्ताओं का कहना है कि फ्लडप्लेन केवल नदी का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि भूजल रिचार्ज, पानी की गुणवत्ता बनाए रखने और भविष्य की जल आवश्यकताओं को पूरा करने वाली महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपदा हैं। इसलिए इन क्षेत्रों का संरक्षण पर्यावरण ही नहीं, बल्कि राजधानी की जल सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है।
डूब क्षेत्र का विस्तार और अनधिकृत बस्तियां
दिल्ली में यमुना नदी का डूब क्षेत्र (फ्लडप्लेन) आधिकारिक तौर पर लगभग 9,700 हेक्टेयर (यानी लगभग 97 वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र में फैला है, जिसे मास्टर प्लान के तहत ओ जोन कहा जाता है। यह इलाका वजीराबाद से ओखला तक करीब 22 किलोमीटर में फैला हुआ है। राजधानी के इस इलाके का उद्देश्य बाढ़ नियंत्रण, पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता की सुरक्षा और यमुना को प्रदूषण से बचाना है। नियमों के अनुसार यहां स्थायी निर्माण नहीं हो सकता है।
यमुना फ्लडप्लेन के भीतर 91 अनधिकृत कॉलोनियां हैं। इनमें मदनपुर खादर, जैतपुर, मीठापुर, झंगोला, सोनिया विहार के कुछ हिस्से, खजूरी खास, करावल नगर समेत यमुना किनारे के कई इलाके शामिल बताए जाते हैं। ओ-जोन बाढ़ क्षेत्र है, इसलिए कई इलाकों का पूरा हिस्सा इसके अंतर्गत नहीं आता है। केवल यमुना के करीब स्थित कुछ हिस्से ही आते हैं।

