पाग दस्तूर में बदली सोच: बेटियां मिल रही है विरासत की बागडोर
पाली में खैरवागढ़ की राजगद्दी पर बनी लड़की
Indianewslive247.com – प ग दस त र म बदल – मारवाड़ क्षेत्र की सदियों पुरानी राजपूती परंपराओं को समय के साथ ढालते हुए पाली जिले का ऐतिहासिक खैरवागढ़ ठिकाना महिला सशक्तिकरण का नया उदाहरण पेश कर रहा है। पूर्व जागीरदार तथा दो बार सरपंच चुने गए ठाकुर हरिश्चंद्र सिंह जोधा के निधन के बाद उनकी बारह वर्षीय पुत्री तेजस्वी कुमारी जोधा को खैरवागढ़ की राजगद्दी की उत्तराधिकारी घोषित किया गया।
हरिश्चंद्र सिंह ने अपने जीवन का अधिकांश समय संतान रहित अवस्था में बिताया था। जीवन के अंतिम चरण में उन्हें पुत्री तेजस्वी का सुख मिला। 15 जून को साठ-आठ वर्ष की आयु में जब उनका देहांत हुआ, तेजस्वी उनकी एकमात्र संतान थीं। वर्तमान में वह सातवीं कक्षा की छात्रा हैं।
पुरुष उत्तराधिकारी न होने के बावजूद परिवार ने किसी रिश्तेदार को गोद लेने के बजाय तेजस्वी को ही विरासत सौंपने का निर्णय लिया। आजकल कई स्थानों पर केवल औपचारिकता के तौर पर बेटियों को पाग दस्तूर के दौरान पगड़ी पहनाई जाती है, परंतु खैरवागढ़ ने इससे आगे बढ़ते हुए उन्हें राजगद्दी की वास्तविक उत्तराधिकारी घोषित किया।
65 वर्ष बाद हुआ पाग का दस्तूर
खैरवागढ़ परिवार में लगभग पचहत्तर वर्षों बाद ‘पाग का दस्तूर’ आयोजित किया गया। पुरुष उत्तराधिकारी न होने के कारण यह परंपरा लंबे समय से विराम पर थी। परंपरागत रूप से ऐसे मामलों में दूर के रिश्तेदार को गोद लेकर गद्दी सौंपी जाती थी, लेकिन इस बार गांव के बुजुर्गों, समाज के प्रतिनिधियों, जागीरदारों और ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से तेजस्वी को उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लिया।
समारोह का आयोजन सत्रहवीं सदी के ऐतिहासिक खैरवागढ़ किले में वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच किया गया। मारवाड़ (जोधपुर) राजपरिवार की ओर से महाराजा गजसिंह के प्रतिनिधि उपस्थित हुए और उन्होंने आधिकारिक गुलाबी पगड़ी तेजस्वी के सिर पर बांधी।
राजपूती परंपरा के तहत युवराज सुरेंद्र शंकर सिंह ने तलवार से अंगूठे पर हल्का चीरा लगाकर निकले रक्त से तेजस्वी का राजतिलक किया। समारोह में मारवाड़ के कई जागीरदार परिवारों, विभिन्न ठिकानों के प्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भाग लिया।
850 साल पुराना है खैरवागढ़ का इतिहास
खैरवागढ़ की शासकीय विद्यालय के शिक्षक गोविंद सिंह राजपुरोहित के अनुसार इस जागीर का इतिहास लगभग आठ सौ पचास वर्ष पुराना है। कन्नौज के राजकुमार राव सीहा वर्ष 1155 के आसपास मारवाड़ आए थे और उन्होंने राठौड़ राजवंश की नींव रखी थी। आजादी से पहले खैरवागढ़ ठिकाने के अधीन अड़तालीस गांव थे, जो बाद में घटकर बारह गांव रह गए।
तेजस्वी कुमारी जोधा ने कहा कि वह अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए पिता के अधूरे सपनों को पूरा करेंगी और गांव के विकास के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करेंगी। ग्रामीणों ने इस निर्णय को बेटियों के सम्मान और समान अधिकार की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया।
नागौर में भी टूटी परंपरा की नई मिसाल
नागौर जिले की रियां बड़ी पंचायत समिति के सुरियास गांव में भी ऐसी ही मिसाल देखने को मिली। यहां दिवंगत कानसिंह राठौड़ की दस वर्षीय पुत्री भाविका कंवर को ‘पाग दस्तूर’ कर परिवार की आधिकारिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया। कानसिंह राठौड़ का 15 जुलाई को बीमारी के कारण निधन हो गया था। उनकी एकमात्र संतान भाविका कंवर है।
बारहवें की रस्म के दौरान परंपरा के अनुसार किसी निकट संबंधी को गोद लेने पर चर्चा हो रही थी। तभी परिवार की महिलाओं ने स्पष्ट कहा कि बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं होता, इसलिए पाग दस्तूर भाविका का ही होगा। परिवार के इस फैसले का पीहर और ससुराल पक्ष ने सर्वसम्मति से समर्थन किया।
इसके बाद दादी के पीहर पक्ष से शंकरसिंह राजावत और ननिहाल पक्ष से महावीरसिंह सिंगोद ने भाविका को पगड़ी पहनाकर ‘पाग दस्तूर’ की रस्म पूरी कराई। इस निर्णय को ग्रामीणों ने बदलते समाज और बेटियों को समान अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

