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आज का शब्द: अवगाह और रामधारी सिंह “दिनकर” की कविता- नई आवाज

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आज क शब द: अवगाह शब्द और रामधारी सिंह दिनकर की कविता नई आवाज

Indianewslive247.com – आज क शब द के इस विशेष अंक में हम आपके लिए लाए हैं एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिंदी शब्द—अवगाह। यह शब्द हिंदी साहित्य में गहराई और समझ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है। अवगाह का अर्थ है अथाह गहराई में उतरना या किसी विषय को पूरी तरह से समझना। इस शब्द के संदर्भ में हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर की रचना ‘नई आवाज’।

रामधारी सिंह दिनकर: एक संक्षिप्त परिचय

रामधारी सिंह दिनकर हिंदी साहित्य के महानतम कवियों में से एक हैं। उनकी कविताओं में राष्ट्रीय भावना, सामाजिक जागरूकता और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय मिलता है। ‘नई आवाज’ उनकी एक ऐसी कविता है जिसमें नए विचारों और नए स्वर की खोज का वर्णन किया गया है। आज क शब द के इस अंक में हम इसी कविता के माध्यम से ‘अवगाह’ शब्द के महत्व को समझेंगे।

कविता: नई आवाज

[1] यहाँ की वेदनाएँ कभी की जा चुकी हैं, क्या तुम गगन को नए स्वर के लिए छानते हो? तारे भेद बताएँ, क्या उन्हें कुछ ज्ञात भी है? चाँद कुछ कहे, क्या उसके पास कोई बात भी हो?

[2] निशानी घटा पर है, मगर किसके चरण की? यह राज़ यहाँ पर भी कोई नहीं जानता। सनातन और अचल है, स्वर्ग चलता ही नहीं, तृषा की आग में पिघलता ही नहीं। जिसको बेताबियों के मजे मालूम ही नहीं, नई आवाज की दुनिया उसे क्यों मानता है?

[3] धुओं का देश है नादान! यह छलना बड़ी है, नई अनुभूतियों की खान वह नीचे पड़ी है। मुसीबत से बिंधी जो जिन्दगी, रौशन हुई वह, किरण को ढूँढता लेकिन, नहीं पहचानता है।

[4] गगन में तो नहीं बाकी, जरा कुछ है असल में, नए स्वर का भरा है कोष पर, अब तक अतल में। धारा सुधा की कढ़ेगी तोड़कर कारा अभी, शरासन को श्रवण तक तू नहीं क्यों तानता है?

[5] नया स्वर खोजनेवाले! तलातल तोड़ता जा, कदम जिस पर पड़े तेरे, सतह वह छोड़ते जा; नई झंकार की दुनिया खत्म होती कहाँ पर? वही कुछ जानता, सीमा नहीं जो मानता है।

[6] वहाँ क्या है कि फव्वारे जहाँ से छूटते हैं, जरा-सी नम हुई मिट्टी कि अंकुर फूटते हैं? बरसता जो गगन से वह जमा होता मही में, उतरने को अतल में क्यों नहीं हठ ठानता है?

[7] हृदय-जल में सिमट कर डूब, इसकी थाह तो ले, रसों के ताल में नीचे उतर अवगाह तो ले। सरोवर छोड़ कर तू बूँद पीने की खुशी में, गगन के फूल पर शायक वृथा संधानता है।

अवगाह शब्द का कविता में महत्व

कविता के अंतिम छंद में ‘अवगाह’ शब्द का प्रयोग विशेष रूप से किया गया है। कवि कहते हैं कि हृदय के जल में सिमटकर डूबना चाहिए और रसों के ताल में नीचे उतरकर अवगाह लेना चाहिए। यह शब्द केवल गहराई का ही नहीं, बल्कि आंतरिक अनुभव और आत्म-जागरूकता का भी प्रतीक है। आज क शब द के इस अंक में हमने देखा कि कैसे एक शब्द कविता के संपूर्ण भाव को समेट लेता है।

अवगाह शब्द का प्रयोग हिंदी में विभिन्न संदर्भों में किया जाता है। जब कोई व्यक्ति किसी विषय को गहराई से समझता है, तो उसे उस विषय का अवगाह कहते हैं। इसी तरह, कविता में भी कवि पाठकों को आंतरिक गहराई में उतरने की प्रेरणा देते हैं। आज क शब द के माध्यम से हम हिंदी भाषा के इन सुंदर शब्दों को आपके सामने लाते हैं।

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