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फ्लाईदुबई हाइजैक की नई कहानी: अपने नागरिक थे सवार, फिर भी विमान को मार गिराने को क्यों तैयार था इस्राइल?

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Foto : Daniel Davis - indianewslive247.com
Table of Contents
  1. फ्लाईदुबई फ्लाइट 1073 की घटना ने इस्राइल के सुरक्षा प्रोटोकॉल पर उठाए गंभीर सवाल
  2. ओमानी पायलट की कथित योजना और उसके दो संभावित लक्ष्य
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  4. Frequently Asked Questions

फ्लाईदुबई फ्लाइट 1073 की घटना ने इस्राइल के सुरक्षा प्रोटोकॉल पर उठाए गंभीर सवाल

Indianewslive247.com – फ ल ईद बई ह इज क – फ्लाईदुबई की फ्लाइट 1073 में 150 से अधिक इस्राइली नागरिक सवार थे, फिर भी इस्राइल उस विमान को मार गिराने की तैयारी तक पहुंच गया था। यह फैसला केवल विमान में मौजूद लोगों की सुरक्षा से जुड़ा नहीं था, बल्कि उस संभावित विनाश को रोकने की कोशिश थी जो विमान के किसी बड़े लक्ष्य से टकराने पर हो सकता था। जांच में सामने आए घटनाक्रम ने दिखाया कि कुछ ही मिनटों में सैन्य, राजनीतिक और हवाई सुरक्षा तंत्र को बेहद कठिन निर्णयों के लिए तैयार होना पड़ा।

विमान का तेज गति से नीचे आना और कॉकपिट से कोई जवाब न मिलना इस्राइली अधिकारियों के लिए गंभीर चेतावनी थी। 14,000 फीट नीचे आने के बाद संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन रेडियो पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। ऐसी स्थिति को सामान्य तकनीकी समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था, क्योंकि विमान की दिशा, ऊंचाई और चालक दल की चुप्पी कई संभावित खतरों की ओर संकेत कर रही थी।

क्यों तैयार किया गया था विमान को गिराने का विकल्प?

इस्राइल के पास ऐसी संभावित घटना के लिए पहले से तैयार व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य किसी विमान को आबादी वाले क्षेत्र, प्रमुख इमारत, बेन गुरियन हवाई अड्डे या अन्य रणनीतिक लक्ष्य से टकराने से रोकना है। इस व्यवस्था का सबसे पीड़ादायक पहलू यह है कि कभी-कभी विमान को नष्ट करना उन हजारों लोगों की जान बचाने का अंतिम विकल्प बन सकता है जो जमीन पर खतरे में हों।

सुरक्षा तंत्र के सामने मूल प्रश्न यह था कि क्या विमान में मौजूद लगभग 150 लोगों की रक्षा के प्रयास में उससे कहीं बड़ी त्रासदी का जोखिम लिया जाए। यदि विमान किसी महत्वपूर्ण ढांचे या भीड़भाड़ वाले स्थान पर जानबूझकर गिराया जाता, तो मौतों की संख्या कई गुना बढ़ सकती थी। इसी आशंका के कारण इस तरह के संकट में सैन्य हस्तक्षेप की संभावना को प्रोटोकॉल का हिस्सा रखा गया है।

ऐसा निर्णय सामान्य परिस्थितियों में कल्पना से परे लगता है, खासकर तब जब यात्रियों में अपने ही देश के नागरिक हों। फिर भी हवाई सुरक्षा में कुछ स्थितियां ऐसी मानी जाती हैं जहां हर विकल्प दुखद होता है और अधिकारियों को कम से कम व्यापक नुकसान वाले रास्ते पर विचार करना पड़ता है।

14,000 फीट पर उतरते विमान के बाद क्या हुआ?

विमान के नीचे आने की सूचना मिलते ही कॉकपिट से बार-बार संपर्क स्थापित करने का प्रयास हुआ। जवाब नहीं मिलने पर पूर्व निर्धारित संकट प्रक्रिया सक्रिय कर दी गई। तत्काल एक समिति को जुटाया गया, कमांड सेंटर स्थापित हुआ और लड़ाकू विमानों को रवाना किया गया। साथ ही, इस्राइल का हवाई क्षेत्र बंद कर दिया गया ताकि किसी अन्य उड़ान को जोखिम से दूर रखा जा सके और सैन्य कार्रवाई की स्थिति में हवाई यातायात बाधा न बने।

कुछ समय बाद पता चला कि विमान इस्राइल की दिशा में बढ़ने के बजाय लगभग 400 मील दूर सऊदी अरब की ओर मुड़ गया है। इस बदलाव के बाद इस्राइली लड़ाकू विमानों को वापस बुला लिया गया। सऊदी अरब ने भी अपने विमान भेजे और अंततः फ्लाइट तबूक में सुरक्षित उतर गई।

इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट हुआ कि संकट के दौरान दिशा में छोटा बदलाव भी सुरक्षा मूल्यांकन को पूरी तरह बदल सकता है। विमान इस्राइली हवाई क्षेत्र से दूर होता गया तो तत्काल हमले का जोखिम घटा, लेकिन तब तक कई स्तरों पर तैयारियां की जा चुकी थीं।

अगर फ्लाइट इस्राइल की ओर बढ़ती रहती

यदि विमान एक निश्चित सीमा तक इस्राइल की ओर आता रहता, तो इस्राइल अपने लड़ाकू विमानों को जॉर्डन के हवाई क्षेत्र में भेजने की तैयारी कर सकता था। लड़ाकू पायलटों का पहला काम विमान को नष्ट करना नहीं, बल्कि जितना संभव हो सके कॉकपिट के करीब पहुंचकर स्थिति समझना होता। वे यह देखने की कोशिश करते कि पायलट नियंत्रण में हैं या नहीं, कॉकपिट में कोई संघर्ष तो नहीं चल रहा और विमान की गतिविधियां जानबूझकर की जा रही हैं या किसी तकनीकी गड़बड़ी का नतीजा हैं।

इसके बाद केबिन के हालात का आकलन भी महत्वपूर्ण होता। यात्रियों में घबराहट, असामान्य गतिविधि या किसी संभावित हिंसक नियंत्रण के संकेत मिलने पर यह जानकारी वायुसेना और संकट समिति तक पहुंचाई जाती। यदि यह निष्कर्ष निकलता कि विमान का अपहरण हो चुका है, रेडियो संपर्क जानबूझकर बंद रखा गया है और कोई मांग भी सामने नहीं रखी गई, तो खतरे को अत्यधिक गंभीर माना जाता।

ऐसी स्थिति में रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री को एक साथ निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाता। प्रोटोकॉल के तहत किसी संदिग्ध विमान को इस्राइल की तरफ बढ़ते हुए रोकने का प्रावधान है, लेकिन उसे मार गिराने का अंतिम आदेश केवल प्रधानमंत्री दे सकते थे। यह निर्णय सैन्य स्तर का नहीं, बल्कि सर्वोच्च राजनीतिक जिम्मेदारी वाला फैसला होता।

ओमानी पायलट की कथित योजना और उसके दो संभावित लक्ष्य

जांच में ओमानी पायलट हमाम अल-हम्मामी को इस घटना का मुख्य हमलावर बताया गया है। उसकी पहली कथित योजना विमान को बेन गुरियन हवाई अड्डे से टकराने की थी। यदि वह योजना सफल न होती, तो जॉर्डन में स्थित एक अमेरिकी सैन्य अड्डे को दूसरे लक्ष्य के रूप में चुना गया था।

“मैंने खोजा और जांचा कि कौन-सी कंपनी तेल अवीव जाती है और इसीलिए मैंने फ्लाईदुबई को चुना।”

यह कथन संकेत देता है कि एयरलाइन का चयन आकस्मिक नहीं था। जांचकर्ताओं के सामने अल-हम्मामी ने यह भी कहा कि वह तेल अवीव जाने वाली उड़ान खोज रहा था। पूछताछ में यह बात भी सामने आई कि उसने फ्लाईदुबई में नौकरी मिलने से पहले ही इस हमले की योजना तैयार कर ली थी। वह पहले भी इस्राइल के लिए उड़ान भर चुका था।

गाजा युद्ध को बताया प्रेरक कारण

अल-हम्मामी ने कथित तौर पर गाजा में इस्राइल के सैन्य अभियान का बदला लेने की इच्छा को अपने कदम की वजह बताया। जांच के निष्कर्षों में इसे अचानक लिया गया निर्णय नहीं, बल्कि पहले से तैयार किया गया आतंकी षड्यंत्र माना गया है। एयरलाइन, गंतव्य और संभावित निशानों का चयन इस धारणा को मजबूत करता है कि हमले की तैयारी लंबे समय से की जा रही थी।

फिलहाल शुरुआती जांच में मामला अकेले व्यक्ति द्वारा किए गए हमले जैसा दिख रहा है। फिर भी यह निष्कर्ष अंतिम नहीं है और यह पता लगाने की कोशिश जारी है कि क्या अल-हम्मामी को किसी संगठन, सहयोगी या बाहरी नेटवर्क से सहायता मिली थी।

फ्लाइट 1073 की घटना केवल विमानन सुरक्षा का मामला नहीं है। इसने यह भी दिखाया कि आतंकवाद की आशंका वाले संकट में सरकारों को कभी-कभी ऐसे विकल्पों पर विचार करना पड़ता है जिनमें कोई भी फैसला पूरी तरह मानवीय पीड़ा से मुक्त नहीं होता। विमान का तबूक में सुरक्षित उतरना बड़ी राहत रहा, लेकिन इस घटना ने हवाई सुरक्षा, पायलटों की जांच और अंतरराष्ट्रीय समन्वय की अहमियत को फिर सामने ला दिया।

Frequently Asked Questions

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