Aaj Ka Shabd

आज का शब्द: तरुणी और सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” की कविता- रेखा

आज का शब्द: तरुणी और सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” की कविता- रेखा

आज क शब द – हिंदी हैं हम शब्द शृंखला के अंतर्गत आज का शब्द तरुणी है। इसका अर्थ जवान स्त्री या युवती होता है। इस शब्द के साथ संगत होकर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता ‘रेखा’ भी प्रस्तुत कर रहे हैं।

कविता ‘रेखा’ के अंग

यौवन के तीर पर प्रथम था आया जब श्रोत सौन्दर्य का, वीचियों में कलरव सुख चुम्बित प्रणय का था मधुर आकर्षणमय, मज्जनावेदन मृदु फूटता सागर में।

आयुष्य के शुरुआती चरणों में जब अनुभव गहराई ले रहे थे, तब ध्यान केंद्रित होता रहता था उस अज्ञात वस्तु पर जो आकर्षित करती है। तीर से लेकर बहने वाली बहाव वैसा ही होता रहता था जैसे कलरव के गहन रूप में सुख छिपे होते थे, और प्रेम एक अद्भुत चमक में जगत रहता था।

जब निजी सीमाओं के आगे ध्यान गमन करता है, तब अज्ञानता के विस्तार में निजी विवेक जैसे शैतान बहता रहता है। उस वक्त जिस तरह से शरीर के चरणों का प्रतीक बन जाता है, उसी तरह असीमता की छाया में जो आती है वह निराला दिग्गज भी अकूलता करता रहता है।

दिग्गज दृढ़ वेग से एक स्मृति दूर तक फैलता है। चारों ओर जैसे समीर के स्पर्श से प्राण जीवित रहते हैं, उसी तरह यह आकर्षण अनुभव के रूप में प्रकट होता रहता है। चरणों की रहित रेखा वहां तक दूर जाती है जहां चिर-कालिक कालिमा बनी हुई है।

उस वेला जब यह ध्रुवतारा असीमता को लाई हुई है, तब शब्द-रस-रूप-गन्ध की सम्पूर्ण छाया गहरी हो जाती है। शब्द-रस की बहाव में अतीत छिपे हुए स्मृति-रेखा खुलती रहती है। चिर-संचित जड़ता की याद निर्जन-प्रियता में बिना विवेक के विराजमान रहती है।

देखते हैं प्रकृति चित्र, उस बिना भी जिस प्रकार स्मृति की छाया चिर-पोषित होती है। तापहर हृदय वेग लग्न एक ही स्मृति में, भाषा के बिना भावना का वेग जैसे कम्पन उस जगह खुलता है जहां स्वागत वन्दना छिपे हुई होती है।

बिना शब्द-अर्थ के प्रेम अनुभव करता रहता है। चिर-कालिक कालिमा दूर हुई है, लेकिन ध्रुवतारा की गति में एक असीमित छाया तन्मयता के रूप में प्रकट हो जाती है। अंतर की कथा तब बोलती रहती है जब अंग अज्ञात किसी का स्पर्श करते हैं।

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