आज का शब्द: शम्पा और वीरेन्द्र वत्स की कविता- छोड़ दूँ कैसे मिलन की आस
आज क शब द – हिंदी हैं हम शब्द शृंखला के हिस्से में आज का शब्द है शम्पा, जिसे विद्युत, बिजली और कमर के रूप में व्याख्या किया जाता है। कविता तीन अंगों में विभाजित है- परामर्श, प्रतिक्रिया और प्रयाण।
परामर्श
अभिसार के छोड़ो मिलन की आस विजन वन में रजनी भयंकर क्षुब्ध शम्पा उग्र अंबर कर रहे हर जीव के अस्तित्व का उपहास अभिसार के छोड़ो मिलन की आस गर्जना करतीं हवाएँ चीखतीं चारों दिशाएँ मेघ के उर में कुटिल दुर्भावना का वास अभिसार के छोड़ो मिलन की आस उर्मि या चल शैलमाला व्योम से किसने उछाला हरहराता-तप्त-फेनिल ध्वंस का उच्छ्वास अभिसार के छोड़ो मिलन की आस गहन तम में आँख फाड़े मृत्यु हिंसातुर दहाड़े कब मिटी है भूख इसकी कब बुझी है प्यास अभिसार के छोड़ो मिलन की आस भावनाओं की दुलारी इस प्रकृति की शक्ति सारी नाशलीला का निरंतर कर रही अभ्यास अभिसार के छोड़ो मिलन की आस यह प्रणय बंधन तुम्हारा जानता था गाँव सारा हो चुका है वह भयावह जलचरों का वास अभिसार के छोड़ो मिलन की आस सृष्टिगत सौंदर्य सारा सहज शरणागत तुम्हारा पट सँभालो हो न इसका प्रलय को आभास अभिसार के छोड़ो मिलन की आस पीन-तनु-सुकुमार-श्यामल स्निग्ध-शिव-निष्काम-निर्मल गात निष्ठुर काल को क्यों दे रही सायास अभिसार के छोड़ो मिलन की आस आह! यदि मैं काल होता दूर रह तुमको सँजोता देखता बस रूप लेकर कर्म से संन्यास
प्रतिक्रिया
अभिसार के छोड़ो मिलन की आस यह साधना इतनी बड़ी यह फिर निराशा ही तुम्हें क्यों आ रही है रास अभिसार के छोड़ो मिलन की आस अर्चना का दीप अंतर जल रहा मेरा निरंतर हो न क्यों प्रियतम समागम का मुझे विश्वास अभिसार के छोड़ो मिलन की आस काल सीमित, प्रीति अक्षय प्रीति रहती चेतनामय देह में चाहे चले, रुक जाय चाहे साँस अभिसार के छोड़ो मिलन की आस वज्र-घन-आँधी-अँधेरे सब अशुभ सौभाग्य मेरे हाँ दुसह मधुमास, मधुमय �
