भारत में तेजी से घट रहा भूजल: 34% निगरानी केंद्रों पर स्तर सामान्य से नीचे, डब्ल्यूएमओ की चेतावनी क्यों अहम?
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भारत में तेजी से घट रहा भूजल, जल सुरक्षा के लिए बढ़ी चिंता
Indianewslive247.com – भ रत म त ज स घटते भूजल स्तर की चेतावनी अब जल सुरक्षा के लिए गंभीर संकेत है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के अनुसार, 2025 में पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध वाले दुनिया भर के 34 प्रतिशत भूजल निगरानी केंद्रों पर जलस्तर सामान्य से कम या बहुत कम दर्ज किया गया। भारत जैसे देश में, जहां सिंचाई और पेयजल के लिए भूजल पर बड़ी निर्भरता है, यह स्थिति विशेष महत्व रखती है।
भूजल का भंडार वर्षा, मिट्टी में पानी के रिसाव, तालाबों, नदियों और अन्य प्राकृतिक स्रोतों से भरता है। लेकिन जब पानी निकालने की रफ्तार पुनर्भरण से अधिक हो जाती है, तो कुएं, हैंडपंप और बोरवेल प्रभावित होने लगते हैं। लंबे सूखे, कम वर्षा और भूमि उपयोग में बदलाव भी इस दबाव को बढ़ा सकते हैं।
34 प्रतिशत केंद्रों पर जलस्तर सामान्य से नीचे
डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 में 34 प्रतिशत निगरानी केंद्रों पर भूजल स्तर सामान्य से कम या बहुत कम था। 2024 में यह अनुपात 25 प्रतिशत था। हालांकि, करीब 31 प्रतिशत केंद्रों पर जलस्तर सामान्य से अधिक या बहुत अधिक भी दर्ज किया गया, जिससे क्षेत्रीय परिस्थितियों में बड़े अंतर का पता चलता है।
ये निष्कर्ष केवल उन स्थानों के आंकड़ों पर आधारित हैं जहां भूजल निगरानी का पर्याप्त डेटा उपलब्ध है। जलस्तर की तुलना 2001 से 2020 की 20 वर्षीय संदर्भ अवधि से की गई है। इसलिए यह आंकड़ा वैश्विक रुझान बताता है, लेकिन हर इलाके की स्थिति को एक जैसा नहीं मानना चाहिए।
भारत और अन्य क्षेत्रों में लंबे समय से दबाव
2022 से 2025 के बीच अमेरिका, यूरोप, मध्य पूर्व, भारत, दक्षिणी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में भूजल की कमी लगातार दर्ज की गई। कई क्षेत्रों में अत्यधिक दोहन को इसका प्रमुख कारण माना गया है। भ रत म त ज स घटते जल भंडार का असर खेती, घरेलू जलापूर्ति और स्थानीय जल स्रोतों पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में उत्तरी भारत में स्थलीय जल भंडारण सामान्य से कम रहा। इसमें सतही जल, मिट्टी की नमी और भूमिगत जल जैसे घटक शामिल होते हैं। जब ये सभी स्रोत कमजोर होते हैं, तो एक बार की अच्छी बारिश भी दीर्घकालिक कमी को तुरंत दूर नहीं कर पाती।
सूखी नदियां और घटते ग्लेशियर भी चेतावनी
डब्ल्यूएमओ ने 2025 को दुनिया की नदियों के लिए तीन दशक से अधिक समय के सबसे शुष्क वर्षों में से एक बताया है। नदियों में कम प्रवाह का असर पेयजल, सिंचाई, पारिस्थितिकी तंत्र और जलविद्युत उत्पादन तक पहुंच सकता है। यह दिखाता है कि जल संकट केवल भूमिगत जल तक सीमित नहीं है।
2025 में लगातार चौथे वर्ष दुनिया के सभी प्रमुख ग्लेशियर क्षेत्रों में बर्फ का द्रव्यमान कम हुआ। ग्लेशियरों की कमी और भूजल में गिरावट, दोनों प्राकृतिक मीठे पानी के भंडार पर बढ़ते दबाव की ओर इशारा करते हैं।
“हम उस बचत खाते को लगातार खाली कर रहे हैं।”
डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने वैश्विक स्थलीय जल भंडारण की स्थिति को इस तरह समझाया। उनके अनुसार, 2014-16 से वैश्विक स्तर पर जमीन पर संचित मीठे पानी में गिरावट का रुझान बना हुआ है।
भारत के लिए भूजल संकट का क्या अर्थ है?
भारत में भूजल सिंचाई और रोजमर्रा की जरूरतों का अहम आधार है। जलस्तर नीचे जाने पर किसानों को गहरे बोरवेल लगाने पड़ सकते हैं, बिजली और सिंचाई की लागत बढ़ सकती है तथा ग्रामीण इलाकों में पेयजल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। भ रत म त ज स उभरती यह चुनौती जल संरक्षण और स्थानीय जल पुनर्भरण की जरूरत को रेखांकित करती है।
बारिश के पानी को सहेजना, तालाबों और जलाशयों का संरक्षण, घरों में वर्षाजल संचयन तथा जरूरत के अनुसार पानी का उपयोग ऐसे कदम हैं जो स्थानीय स्तर पर मदद कर सकते हैं। भूजल की स्थिति हर क्षेत्र में अलग होती है, इसलिए समाधान भी स्थानीय वर्षा, भूगोल और जल उपयोग के अनुसार तय होना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भूजल स्तर कम होने का सीधा असर क्या होता है?
जलस्तर नीचे जाने पर हैंडपंप, कुएं और उथले बोरवेल सूख सकते हैं। इससे पेयजल की उपलब्धता घटने और सिंचाई की लागत बढ़ने का खतरा रहता है।
क्या अच्छी बारिश से भूजल संकट खत्म हो जाता है?
अच्छी बारिश से पुनर्भरण में मदद मिलती है, लेकिन लंबे समय से हो रही अधिक निकासी की भरपाई तुरंत नहीं होती। पानी को जमीन में रिसने देने वाली संरचनाएं और नियंत्रित उपयोग भी जरूरी हैं।
घर पर भूजल बचाने के लिए क्या किया जा सकता है?
लीकेज रोकना, पानी का पुनः उपयोग करना, वर्षाजल संचयन अपनाना और अनावश्यक पानी की बर्बादी कम करना व्यावहारिक कदम हैं। स्थानीय निकायों के जल संरक्षण अभियानों में भागीदारी भी उपयोगी हो सकती है।
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