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Exclusive: ‘आजकल बुरी फिल्मों को भी अच्छा बताया जाता है’, मनोज बाजपेयी ने सिनेमा के बदलते कल्चर पर उठाए सवाल

Exclusive: मनोज बाजपेयी ने फिल्म उद्योग के बदलते कल्चर पर सवाल उठाए

फिल्मों की रेटिंग का अप्रत्यक्ष प्रभाव

Exclusive बयान में मनोज बाजपेयी ने आधुनिक सिनेमा कल्चर के बदलते रूप पर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि आजकल बुरी फिल्मों को अच्छा बताने का एक नया ट्रेंड चल रहा है। “एक्टर्स और उनकी टीम अपनी तरफ से इस बात को साबित कर देती है कि फिल्म अच्छी है,” बाजपेयी ने कहा, “अपने परफॉर्मेंस के द्वारा वो लोगों के दिमाग में अच्छे काम के अंदर जगह बना देते हैं।”

Exclusive फैसला खुद करते हैं

बाजपेयी ने अपने फैसला लेने की विधि को बेहद खास बताया। “मैं अपने फैसला खुद लेता हूं, स्क्रिप्ट पढ़ता हूं या उसका नरेशन लेता हूं,” उन्होंने बताया। “लेकिन आखिर में मेरा ही फैसला होता है, क्योंकि अपना काम शिद्दत से करना चाहिए।” विशेष रूप से उन्होंने अपने सेट पर टीम के आदमी न होने का कारण बताया।

“मेरे सेट पर आपको कोई भी टीम का सदस्य नहीं दिखाई देता। एक्टर्स को अपनी फिल्म के बारे में फैसला लेना चाहिए, क्योंकि उसके बिना आपके काम के अंदर भ्रम आ सकता है।”

फिल्म के आधार पर चीजें तय करते हैं

Exclusive विचार के तहत बाजपेयी ने अपने काम के तरीके को स्पष्ट किया। “मैं अपनी फिल्मों का प्रमोशन करता हूं, लेकिन बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने में यकीन नहीं रखता,” उन्होंने कहा। “मेरा मेकअप, कॉस्ट्यूम और अन्य चीजें मैं खुद संभाल लेता हूं।”

“अगर फिल्म की वाकई जरूरत नहीं होती, तो वो नहीं आते। उनका काम बस रुक जाता है, और अगली फिल्म में दोबारा चले जाते हैं।”

बड़ी फिल्मों में अलग तरीका हो सकता है

बाजपेयी ने छोटी फिल्मों और बड़ी फिल्मों में अलग-अलग तरीका काम करने के बारे में Exclusive बयान दिया। “मैं ज्यादातर छोटी या मीडियम बजट की फिल्में करता रहा हूं, इसलिए हर चीज के लिए मैं फिल्म की जरूरत के आधार पर तय करता हूं।”

“अगर बड़ी फिल्मों में मेकर्स इस प्रकार के सेटअप की इजाजत देते हैं, तो अगली फिल्म में उस तरह की शिकायत करने का भी हक नहीं है। मैं इस बात पर यकीन करता हूं कि जो होगा, वो होगा।”

फिल्म उद्योग में आलोचना और स्वीकृति के बीच बर्बादी

Exclusive विषय के तहत उन्होंने आलोचना और स्वीकृति के माहौल की आलोचना की। “आज बुरी फिल्मों के बारे में आलोचना करने वाले लोग फिल्म के बेहतर रूप के बारे में भी गलत बातें कहते हैं,” बाजपेयी ने कहा। “अपनी टीम के आदमी न होने के कारण आपका विचार विकृत हो सकता है।”

सिनेमा की समीक्षा का एक्टर्स पर भी प्रभाव

मनोज बाजपेयी ने बताया कि आलोचना न केवल फिल्म के गुणों पर बर्बादी करती है, बल्कि एक्टर्स के परफॉर्मेंस तक असर डालती है। “अगर मेरे परफॉर्मेंस को लेकर आलोचना होती है, तो मैं अपनी फिल्म के आधार पर खुद एक्टर्स के रूप की जांच करता हूं।”

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