शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: राजनीतिक रणनीति या लोक-लाज की जीत?
Indianewslive247.com – शनिवार की शाम को जंतर-मंतर पर सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस निर्णय के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अब सरकार को विपक्ष और छात्रों को एक साथ बैठाकर भविष्य की रूपरेखा तैयार करनी होगी।
क्या यह सरकार की हार है?
पूर्णिमा त्रिपाठी का कहना है कि यह जश्न का पल नहीं है। सरकार की हार मान लेना उचित नहीं होगा। यह मामला बच्चों के हित से जुड़ा था। सरकार को अड़ी रहना चाहिए था तो बात सड़कों पर नहीं आती। लाठीचार्ज और पुलिस कार्रवाई की जरूरत नहीं पड़ती।
संसद सत्र आराम से चलेगा। वहां चर्चा भी होगी कि कैसे परीक्षा व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सकता है।
वे आगे कहती हैं कि देश में साफ-सुथरे तरीके से परीक्षा कराने की व्यवस्था मौजूद है। यूपीएससी की प्रतियोगी परीक्षाएं, आईआईटी और आईआईएम की प्रवेश परीक्षाओं में ऐसे मामले सामने नहीं आते। इसका मतलब है कि अचूक तंत्र मौजूद है। नीट के मामले में उसे लागू करने की जरूरत है।
धर्मेंद्र प्रधान ने बड़ी लकीर खींची?
राकेश शुक्ल का मानना है कि ऐसा नहीं कहा जा सकता। चिंता और क्षमा तब मानी जाती, जब त्याग-पत्र स्व-प्रेरित होता। अगर पहले इस्तीफा हो जाता, तो धर्मेंद्र प्रधान दोषमुक्त कहलाते।
प्रधान आज बलिदानी नहीं माने जाएंगे, भले ही उनके खिलाफ कुछ भी प्रपोगैंडा चला हो।
सवाल यह है कि क्या भविष्य में पेपर लीक ही न हो, ऐसा कोई तंत्र मौजूद है। किसी भी तरह की परीक्षा हो, बच्चे उसमें मेहनत करते हैं। पेपर लीक होता है तो मनोबल धराशायी हो जाता है।
सरकार के लिए सबक
राकेश शुक्ल के अनुसार, सरकार को अब विपक्ष और छात्रों को एकसाथ बैठाकर भविष्य की रूपरेखा को अंतिम रूप देना होगा। संदेह के दायरे में यूपीएससी भी आ जाता है। जो सक्षम हैं, वो भी विकलांगता सर्टिफिकेट बनवाकर देश में नौकरियां पा जाते हैं।
यह पूरा मुद्दा राज्यों के आगामी चुनाव का नहीं है। सरकार को समझना होगा कि यह आंदोलन सिर्फ जंतर-मंतर का नहीं है। बच्चों के अलावा अभिभावक भी मानसिक रूप से आंदोलन में शामिल हैं।
जो देश प्रधानमंत्री मोदी पर आंख बंद कर भरोसा करता था, उस भरोसे में संदेह की स्थिति पैदा हुई, इसीलिए शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ।
आंदोलन तो किसानों ने भी किया था, शाहीन बाग में भी आंदोलन हुआ, तब इस्तीफे नहीं हुए। यह छात्र आंदोलन है। युवाओं में नाराजगी है। इसलिए सरकार को समझना पड़ा कि प्रधान के इस्तीफे की वाकई जरूरत थी।
पूरे घटनाक्रम क्या मिथक टूटा?
सुनील शुक्ल का कहना है कि इस इस्तीफ को विपक्षी दल और आंदोलनकारी इस रूप में लेंगे कि सरकार ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है। धर्मेंद्र प्रधान की चिट्ठी को ही देखिए। उस पूरी चिट्ठी में कहीं भी क्षमा-याचना का उल्लेख नहीं है।
इस सरकार का सबसे बड़ा नैरेटिव यह था कि यह आरोपों पर इस्तीफा देने वाली सरकार नहीं है। यह कहा गया कि एनडीए की सरकार में इस्तीफे नहीं होते। यह राजनीतिक नैरेटिव ध्वस्त हो गया।
यह डैमेज कंट्रोल नहीं है। इस्तीफा स्वागत योग्य है। अगर बांध के रिसाव की समय पर मरम्मत न हो, तो बांध टूटने से नहीं रोका जा सकता।
इस्तीफा देर से आया। सरकार ने यह निर्णय विलंब से किया। एक इस्तीफे से यह मामला रुकेगा नहीं। सरकार पर इसका राजनीतिक असर पड़ेगा। विपक्षी दल तो इससे भी आगे की बात कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर माफी मांगें।
क्या लोक-लाज में इस्तीफा हुआ?
विनोद अग्निहोत्री का कहना है कि हां। देर आयद, दुरुस्त आयद। इस सरकार में यह लोक लाज का पहला उदाहरण है कि जनता के दबाव में ही सही और विपक्ष के दबाव में ही सही, सरकार ने इस मुद्दे को माना और प्रधान का इस्तीफा हुआ।
अगर किसान आंदोलन के दबाव में कानून वापस हुए थे, तो वो भी स्वागत योग्य है। यह सरकार की हार नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की जीत है। अब ऐसा समाधान निकले की फुलप्रूफ व्यवस्था बने।
सरकार को विशेषज्ञ समिति बनानी चाहिए और उसकी सिफारिशों पर काम करना चाहिए। सरकार और विपक्ष इसे अब नाक का सवाल न बनाए। जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करना जरूरी होता है।
सरकार ने इस बात को माना। बात सिर्फ नीट परीक्षा की नहीं है। पहले भी ऐसे मामले हुए। सरकार पहले मना करती रही, फिर स्वीकार करती रही। देशभर में एक लाख से ज्यादा सरकारी स्कूल बंद हो गए। ये सब भी बड़े मुद्दे हैं।

