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Islamic NATO: चीन को पहले से थी भनक, मीडिया में मार्च से जारी थी सुरक्षा ढांचे की चर्चा, दस्तावेज में क्या?

Published अगस्त 13, 2026 · Updated अगस्त 13, 2026 · By Michael Martin - indianewslive247.com

Foto : Michael Martin - indianewslive247.com

इस्लामिक नाटो: चीन को था महीनों पहले संकेत

Indianewslive247.com – सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच रक्षा समझौते की घोषणा से काफी पहले ही चीन के राज्य-समर्थित मीडिया में इस तरह के सुरक्षा ढांचे की बातें हो रही थीं। इस्लामिक नाटो के रूप में जाने वाले इस गठबंधन का औपचारिक अस्तित्व 7 अगस्त को आया, पर चीनी मीडिया ने पांच महीने पहले ही इस संस्थागत ढांचे की रूपरेखा पर मुहर लगा दी थी। चीन के सरकारी मीडिया के लेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि बीजिंग को इस सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी महीनों पहले से थी।

चीना डेली का अगस्त से पहले का लेख

सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण चीन के सरकारी अखबार चाइना डेली का 24 जुलाई को प्रकाशित लेख है। इस अखबार ने इस्लामिक नाटो के गठन से दो सप्ताह पहले ही इस लेख में मिस्र को भी शामिल करते हुए यह प्रश्न उठाया कि क्या इन चारों देशों का सहयोग एक नए सुरक्षा ढांचे का केंद्र बन सकता है। यह बात उल्लेखनीय है कि तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान इस गठबंधन में मिस्र के शामिल होने की संभावना जता चुके हैं।

लेख में चारों देशों की क्षमताओं को एक साथ रखकर विश्लेषण किया गया। अखबार ने चारों देशों के संभावित गठबंधन की संस्थागत जरूरतों पर भी चर्चा की। लेख के अनुसार इन चारों देशों का मिलना भूमध्यसागर से दक्षिण एशिया तक फैला एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक गलियारा बनाता है, जिसके पास महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों, ऊर्जा बाजारों और बड़ी आबादी पर प्रभाव है।

मार्च की बैठक से मिला पहला संकेत

इस साल 29 मार्च को पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र और तुर्किये के विदेश मंत्रियों की इस्लामाबाद में बैठक हुई थी। इसका घोषित उद्देश्य पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव कम करना और अमेरिका-ईरान वार्ता के प्रयास आगे बढ़ाना था। चारों विदेश मंत्रियों ने पाकिस्तान की ओर से अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता की मेजबानी के प्रस्ताव का समर्थन किया था।

लेकिन चीनी सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ ने इसको चार देशों का 'क्वाड्रिलेटरल' बताया था। इसके चंद दिनों बाद 2 अप्रैल को चीन के राज्य-समर्थित चैनल सीजीटीएन ने यह सवाल उठाया कि क्या चार देशों का यह सहयोग आगे चलकर 'रक्षा गठबंधन' का रूप ले सकता है। चैनल ने पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के हवाले से लिखा कि ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगा। उस समय चारों देशों के बीच कोई रक्षा गठबंधन बना भी नहीं था। फिर भी चीन के राज्य-समर्थित मीडिया में यह सवाल सामने आ चुका था।

जून में संस्थागत ढांचे की बात

21 जून को शिन्हुआ ने काहिरा में मिस्र, सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की चौथी बैठक को प्रमुखता से रिपोर्ट किया। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने चारों देशों के तंत्र को एक संस्थागत ढांचे में बदलने की जरूरत बताई। 11 जुलाई को शिन्हुआ ने अपनी रिपोर्ट में इसे फिर चारों देशों का 'क्वाड्रिलेटरल मैकेनिज्म' कहा।

बीजिंग भली-भांति समझता है कि यदि पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक के यह इस्लामी देश किसी साझा सुरक्षा ढांचे के तहत आते हैं, तो यह अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभाव को वैश्विक दक्षिण में टक्कर दे सकता है। साथ ही पाकिस्तान के जरिए सऊदी अरब और तुर्किये के साथ गठजोड़ चीन की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के लिए एक सुरक्षित सामरिक गलियारा भी तैयार कर सकता है। इसीलिए चीन इस समीकरण के आकार लेने से महीनों पहले से इसके हर मूवमेंट पर नजर बनाए था।

इस्लामिक नाटो के गठन से पहले ही चीन के मीडिया में इस सुरक्षा ढांचे की चर्चा शुरू हो चुकी थी, जो बीजिंग की भू-राजनीतिक समझ को दर्शाता है।

इस्लामिक नाटो से जुड़े अक्स पूछे जाने वाले सवाल

इस्लामिक नाटो कौन-कौन से देश शामिल हैं? इस्लामिक नाटो में सऊदी अरब, पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र शामिल हैं। इन चारों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाया जा रहा है।

चीन को इस्लामिक नाटो के बारे में कब पता चला? चीन के राज्य-समर्थित मीडिया में मार्च 2026 से ही इस सुरक्षा ढांचे की चर्चा जारी थी। चाइना डेली ने जुलाई में इसकी पुष्टि की।

इस्लामिक नाटो का उद्देश्य क्या है? इस्लामिक नाटो का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया में सुरक्षा सहयोग बढ़ाना, अमेरिकी प्रभाव को संतुलित करना और सामरिक गलियारे तैयार करना है।

क्या मिस्र इस्लामिक नाटो का सदस्य बन सकता है? तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने मिस्र के शामिल होने की संभावना जताई है। मिस्र के राष्ट्रपति ने भी संस्थागत ढांचे में बदलाव की जरूरत बताई है।

इस्लामिक नाटो चीन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? इस्लामिक नाटो चीन की परियोजनाओं के लिए सुरक्षित सामरिक गलियारा तैयार कर सकता है और अमेरिकी प्रभाव को वैश्विक दक्षिण में टक्कर दे सकता है।

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