वांगचुक का सरकार को संदेश: प्रदर्शन रोकने के बजाय जनता की आवाज सुनिए; क्यों दी श्रीलंका-बांग्लादेश की मिसाल?
विरोध की आवाज को समझना सरकारों के लिए बेहतर रास्ता: सोनम वांगचुक
Indianewslive247.com – व गच क क सरक र क - जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक ने कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को रोकने के बजाय सरकारों को उनमें उठ रही बातों को सुनना चाहिए। मुंबई में आईपीएफ महोत्सव के दौरान उन्होंने यह विचार रखा कि नागरिकों का विरोध किसी सरकार के लिए केवल चुनौती नहीं, बल्कि अपनी नीतियों और कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने का अवसर भी हो सकता है।
वांगचुक ने श्रीलंका और बांग्लादेश का उल्लेख करते हुए कहा कि जन-असंतोष को अभिव्यक्त होने का स्थान न मिलने पर हालात अधिक तनावपूर्ण हो सकते हैं। उनका तर्क था कि विरोध की वैध और शांतिपूर्ण जगहें बनी रहें तो जनता अपनी बात सीधे ढंग से रख सकती है और सरकार को समय रहते प्रतिक्रिया मिलने का माध्यम मिलता है।
“विरोध प्रदर्शन सरकारों को बेहतर काम करने का मौका देने का एक अच्छा तरीका हैं। ये प्रतिक्रिया देने का माध्यम हैं।”
संसद के पास प्रदर्शन की जगह का सवाल
वांगचुक ने दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में संसद भवनों के आसपास होने वाले प्रदर्शनों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन, नॉर्वे और स्वीडन जैसे देशों में लोगों को संसद के निकट विरोध जताने की अनुमति मिलती है। उनके मुताबिक, अनेक देशों में संसद के सामने का क्षेत्र सार्वजनिक विरोध का प्रमुख स्थल माना जाता है।
भारत की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि यहां प्रदर्शन अक्सर संसद से काफी दूर आयोजित होते हैं। जंतर-मंतर को विरोध के स्थान के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन वांगचुक के अनुसार वह भी संसद से दूरी पर है। उनका कहना था कि विरोध की आवाज और निर्णय लेने वाली संस्थाओं के बीच अत्यधिक दूरी संवाद को कमजोर कर सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में सरकारों को आलोचना या असहमति से बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यदि प्रदर्शनकारियों के संदेश को समझा जाए, तो प्रशासन यह पहचान सकता है कि किस मुद्दे पर लोगों की चिंता बढ़ रही है और कहां सुधार की आवश्यकता है।
जंतर-मंतर पर अनुमति को लेकर चर्चा
वांगचुक की टिप्पणी ऐसे समय आई जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति को लेकर राजनीतिक बहस तेज थी। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के समर्थन में वहां प्रदर्शन का आह्वान किया था। इसके बाद केंद्र सरकार के रुख को लेकर विवाद हुआ और विपक्षी दलों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति न दिए जाने की आलोचना की।
उन्होंने कहा कि नागरिकों को विरोध करने के लिए सामान्य रूप से अनुमति मांगने की बाध्यता नहीं होनी चाहिए। हालांकि, शहर में होने वाली गतिविधियों की जानकारी और व्यवस्थागत समन्वय के लिए सूचना या अनुमति संबंधी प्रक्रिया का उपयोग किया जा सकता है। वांगचुक ने त्योहारों जैसे बड़े आयोजनों का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसी व्यवस्था प्रशासन को यातायात, सुरक्षा और अन्य प्रबंधों की तैयारी में मदद दे सकती है।
“विरोध प्रदर्शन करने के लिए अनुमति नहीं मांगी जानी चाहिए।”
पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने सड़कों पर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार बताया। इस अधिकार का अर्थ व्यवस्था भंग करना नहीं, बल्कि अनुशासित और अहिंसक तरीके से असहमति दर्ज कराना है। वांगचुक के विचार में प्रशासन की भूमिका ऐसी अभिव्यक्ति को समझने और सार्वजनिक व्यवस्था के साथ संतुलन बनाने की होनी चाहिए।
गिरफ्तारियों और बलों की तैनाती पर प्रतिक्रिया
सीजेपी के नेताओं समेत प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी के मुद्दे पर वांगचुक ने सरकार को संदेशवाहक पर कार्रवाई करने के बजाय उसकी बात पर विचार करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि अनावश्यक कदमों से लोग सरकार के खिलाफ हो सकते हैं, जिसका नुकसान अंततः सरकार को ही उठाना पड़ता है।
“संदेश देने वाले को मत मारिए। संदेश को समझिए।”
उन्होंने कहा कि सरकार को वही निर्णय लेने चाहिए जो सही हों और जिनकी वास्तव में जरूरत हो। वांगचुक ने केंद्र सरकार को निशाने पर लेते हुए अर्धसैनिक बलों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार ये बल गृह मंत्रालय के अधीन हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल अपने ही लोगों, युवाओं और उनके जैसे आवाज उठाने वालों के खिलाफ किया जा रहा है।
महीने की शुरुआत में सीजेपी की ओर से प्रस्तावित प्रदर्शन के बाद अर्धसैनिक बलों की तैनाती को लेकर भी केंद्र की आलोचना हुई थी। वांगचुक के वक्तव्य ने इस बहस को फिर सामने रखा कि विरोध प्रदर्शनों से निपटते समय सुरक्षा व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए।
एचआईएएल भूमि आवंटन का मुद्दा भी चर्चा में
लद्दाख प्रशासन द्वारा हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख (एचआईएएल) को आवंटित भूमि रद्द किए जाने के बाद भी वांगचुक केंद्र में रहे हैं। प्रशासन ने अपने फैसले का बचाव करते हुए वांगचुक की ओर से कानून की अनदेखी का उल्लेख किया था। प्रशासन का कहना था कि बकाया भुगतान न होने और पट्टा समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए जाने के कारण भूमि आवंटन स्वतः समाप्त हो गया था।
वांगचुक की ताजा टिप्पणी का मूल संदेश यही रहा कि असहमति को दबाने की जगह उसके कारणों को समझना जरूरी है। उनके अनुसार शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों और सरकार के बीच संवाद का जरिया है, और उस संवाद को स्वीकार करना बेहतर प्रशासन की दिशा में एक उपयोगी कदम हो सकता है।
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