जयशंकर की दो टूक: आतंकवाद को पालने वाले देशों पर कसे शिकंजा, युद्ध नहीं बातचीत से निकलेगा शांति का रास्ता
आतंकवाद और युद्ध पर जयशंकर का स्पष्ट संदेश: शांति के लिए सहयोग और संवाद जरूरी
Indianewslive247.com – जयश कर क द ट क - विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक शांति के सामने मौजूद चुनौतियों को रेखांकित करते हुए कहा है कि आतंकवाद को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं माना जा सकता। दिल्ली में आयोजित ‘चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन’ में उन्होंने कहा कि जब आतंकवाद को राज्य की नीति अथवा राजनीतिक हितों के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तब उसका असर केवल एक देश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय स्थिरता को भी नुकसान पहुंचाता है।
उन्होंने देशों से आग्रह किया कि वे आतंकवाद के हर स्वरूप के विरुद्ध साझा और दृढ़ रुख अपनाएं। जयशंकर के अनुसार, इस मुद्दे पर चयनात्मक रवैया या किसी भी तरह की ढिलाई दुनिया में शांति स्थापित करने के प्रयासों को कमजोर कर सकती है।
“आतंकवाद शांति के लिए बड़ा खतरा है और इसे किसी भी हाल में राज्य की नीति का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।”
आतंकवाद के लिए बहाने की कोई जगह नहीं
विदेश मंत्री ने कहा कि हिंसक आतंकी गतिविधियों को उचित ठहराने के लिए कोई तर्क, परिस्थिति या बहाना स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि दुनिया ने समय-समय पर आतंकवाद के खतरों से सबक लिए हैं, फिर भी कुछ देश अपने संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों को प्राथमिकता देते हुए पर्याप्त कठोर कदमों से बचते हैं।
उनका संदेश यह था कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई केवल सुरक्षा एजेंसियों या प्रभावित देशों का दायित्व नहीं है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक इच्छाशक्ति, सहयोग और समान मानदंडों की जरूरत है। यदि किसी क्षेत्र में आतंकी ढांचे को अनदेखा किया जाता है, तो उसका प्रभाव सीमाओं से आगे तक फैल सकता है।
जयशंकर ने जोर दिया कि वैश्विक समुदाय को आतंकवाद के वित्तपोषण, समर्थन, प्रशिक्षण और प्रचार सहित उसके सभी रूपों के प्रति सतर्क रहना होगा। शांति की दिशा में गंभीर प्रगति तभी संभव है, जब देशों का रवैया सिद्धांतों पर आधारित हो और वे सुविधा के हिसाब से अलग-अलग मानक न अपनाएं।
युद्ध का असर दुनिया भर पर पड़ता है
सम्मेलन में जयशंकर ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि किसी भी क्षेत्र में भड़कने वाला युद्ध अंततः पूरी दुनिया की शांति और स्थिरता को प्रभावित करता है। संघर्ष के परिणाम केवल युद्धभूमि तक नहीं रहते; वे विकास, आर्थिक गतिविधियों, मानवीय स्थिति और देशों के आपसी विश्वास पर भी असर डालते हैं।
मौजूदा समय के दो बड़े संघर्षों के संदर्भ में भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट बताया गया—विवादों से बाहर निकलने का रास्ता संवाद और कूटनीति से होकर जाता है। उन्होंने संकेत दिया कि सैन्य टकराव स्थायी समाधान देने के बजाय अक्सर नई चुनौतियों को जन्म देता है।
“स्थायी शांति के लिए आपसी सहयोग, बातचीत और कूटनीति को प्राथमिकता देना जरूरी है।”
संवाद का अर्थ केवल बातचीत शुरू करना नहीं, बल्कि मतभेदों के बीच भी समाधान की संभावना बनाए रखना है। कूटनीति देशों को अपनी चिंताएं रखने, तनाव घटाने और साझा हितों के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर देती है। जयशंकर की टिप्पणी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब वैश्विक तनावों के कारण अनेक क्षेत्रों में अनिश्चितता बनी हुई है।
प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग का संतुलन
विदेश मंत्री ने देशों के आपसी संबंधों में प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच संतुलन की जरूरत पर भी बात की। उन्होंने कहा कि मानव समाज में लंबे समय से दो प्रवृत्तियां दिखाई देती रही हैं। एक प्रवृत्ति प्रतिस्पर्धा पर जोर देती है, जबकि दूसरी मिलकर काम करने को बेहतर विकल्प मानती है। यही अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी नजर आता है।
देश अपने हितों की रक्षा करते हैं और कई मुद्दों पर उनके बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। लेकिन वैश्विक समस्याओं का स्वरूप ऐसा है कि उनका समाधान अकेले संभव नहीं होता। आतंकवाद, हिंसा, अस्थिरता और विकास से जुड़ी चुनौतियां सीमाओं का सम्मान नहीं करतीं। इसलिए राष्ट्रीय हितों और व्यापक वैश्विक जिम्मेदारियों के बीच संतुलित दृष्टि आवश्यक है।
जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब आठ दशक पहले दुनिया ने साझा लक्ष्यों के लिए सहयोग की व्यवस्था खड़ी करने का प्रयास किया था। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 1 में भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा उद्देश्यों की भावना को स्थान दिया गया है।
शांति, विकास और समृद्धि का संबंध
उन्होंने शांति और समृद्धि को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ बताया। किसी भी समाज की प्रगति के लिए स्थिर वातावरण आवश्यक होता है, जबकि संघर्ष और हिंसा विकास की रफ्तार को बाधित करते हैं। जब संसाधन असुरक्षा और टकराव से निपटने में खर्च होते हैं, तब शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और जनकल्याण जैसे क्षेत्रों पर ध्यान प्रभावित हो सकता है।
जयशंकर ने यह भी कहा कि ऐसी वैश्विक व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती, जिसमें एक हिस्सा समृद्ध हो और दूसरा हिस्सा बुनियादी जरूरतों से वंचित बना रहे। इसीलिए देशों को अपने तत्काल हितों के साथ दुनिया की व्यापक आवश्यकताओं को भी समझना चाहिए।
उनकी टिप्पणी का केंद्रीय संदेश यही रहा कि युद्ध और आतंकवाद किसी समस्या का स्थायी उत्तर नहीं दे सकते। टिकाऊ शांति के लिए विश्वास, सहयोग, कूटनीतिक प्रयास और हिंसा के प्रति स्पष्ट अस्वीकार आवश्यक हैं। दुनिया के सामने मौजूद चुनौतियों के बीच यह दृष्टिकोण संवाद को कमजोरी नहीं, बल्कि स्थिर और न्यायपूर्ण भविष्य की दिशा में जरूरी साधन के रूप में प्रस्तुत करता है।
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