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आरएसएस: ‘धर्म और राष्ट्र अविभाज्य हैं’, अशांत दुनिया में भारत की भूमिका पर क्या बोले संघ प्रमुख मोहन भागवत?

Published अक्टूबर 2, 2026 · Updated अक्टूबर 2, 2026 · By Charles Gonzalez - indianewslive247.com

Foto : Charles Gonzalez - indianewslive247.com

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म और राष्ट्र पर क्या कहा?

Indianewslive247.com – आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मुंबई में कहा कि भारत के संदर्भ में धर्म और राष्ट्र को अलग-अलग नहीं समझा जा सकता। अखिल भारतीय विहार सेवा समूह के 14वें सम्मेलन में उन्होंने कहा कि राष्ट्र की शक्ति और धर्म की रक्षा एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

आरएसएस प्रमुख के अनुसार, राष्ट्र का उद्देश्य धर्म से संबद्ध है और धर्म समाज तथा देश को दिशा देता है। उन्होंने कहा कि जब राष्ट्र कमजोर होता है तो उसके धार्मिक और सांस्कृतिक आधार भी प्रभावित होते हैं। इसलिए दोनों को साथ लेकर चलना समाज की जिम्मेदारी है।

“राष्ट्र कमजोर होगा तो धर्म भी प्रभावित होगा। दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है।”

दुनिया के सामने संतुलन की चुनौती

मोहन भागवत ने कहा कि आज दुनिया कई विरोधाभासों से जूझ रही है। विकास की जरूरत और पर्यावरण संरक्षण, व्यक्ति की स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन, तथा धार्मिक विश्वास और संघर्ष के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है।

उन्होंने कहा कि दुनिया के अनेक हिस्सों में यह संतुलन बिगड़ता दिखता है। कई बार एक समस्या का समाधान खोजने पर दूसरी कठिनाई खड़ी हो जाती है। ऐसे में केवल तात्कालिक उपायों के बजाय ऐसी दृष्टि की जरूरत है, जो अलग-अलग मूल्यों और आवश्यकताओं में सामंजस्य बना सके।

आरएसएस प्रमुख ने दुनिया की जटिल समस्याओं के समाधान के लिए संतुलित सोच पर जोर दिया। उनके मुताबिक, किसी एक पक्ष को प्राथमिकता देकर स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता।

भारत की ज्ञान-परंपरा का उल्लेख

भागवत ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा वैश्विक चुनौतियों के समाधान में उपयोगी मार्गदर्शन दे सकती है। उनके अनुसार, भारत ने इतिहास में अपना ज्ञान और विचार दुनिया तक पहुंचाए, लेकिन दूसरे देशों पर अधिकार स्थापित करने या धर्म परिवर्तन को इसका माध्यम नहीं बनाया।

“दुनिया को आशा है कि इन चुनौतियों से निकलने का रास्ता भारत से सामने आएगा।”

उन्होंने वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, जैन आगम, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब का उल्लेख किया। साथ ही संतों की शिक्षाओं को भारत की व्यापक बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।

भागवत के अनुसार, इन ग्रंथों और शिक्षाओं के विचार किसी एक समुदाय या समय तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि भारत के पास ज्ञान की ऐसी समृद्ध परंपरा है, जिसकी आवश्यकता आज मानवता महसूस कर रही है।

परंपराओं के संरक्षण पर जोर

संघ प्रमुख ने ज्ञान और परंपराओं को जीवित रखने वालों की रक्षा को मानवता की सेवा बताया। उनका कहना था कि इन परंपराओं को आगे बढ़ाने वाले व्यक्तियों और समुदायों का संरक्षण केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि सुरक्षित भविष्य से जुड़ा कार्य है।

आरएसएस के सरसंघचालक ने कहा कि ऐसी विरासत की रक्षा का अर्थ केवल लोगों की सुरक्षा नहीं है, बल्कि उन मूल्यों और अनुभवों को बचाना भी है जो आने वाली पीढ़ियों के काम आ सकते हैं।

उनके संबोधन का केंद्रीय संदेश यह रहा कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराएं राष्ट्र की शक्ति से अलग नहीं हैं। उन्होंने विश्व में मौजूद संघर्ष और असंतुलन के बीच भारत की ज्ञान-संपदा को संभावित मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न: मोहन भागवत ने धर्म और राष्ट्र के बारे में क्या कहा?

उत्तर: उन्होंने कहा कि भारत के संदर्भ में धर्म और राष्ट्र को अलग करके नहीं देखा जा सकता तथा राष्ट्र की शक्ति और धर्म की रक्षा परस्पर जुड़ी हैं।

प्रश्न: आरएसएस प्रमुख ने भारत की भूमिका को कैसे बताया?

उत्तर: उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा दुनिया के सामने मौजूद जटिल चुनौतियों के समाधान के लिए मार्गदर्शन दे सकती है।

प्रश्न: भागवत ने किन ग्रंथों का उल्लेख किया?

उत्तर: उन्होंने वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, जैन आगम, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब सहित संतों की शिक्षाओं का उल्लेख किया।

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