UP: ‘चलो सब कुछ बेचकर नेपाल बस जाते हैं, बेटी की गुहार भी रही बेअसर; शिकोहाबाद हत्या और खुदकुशी कांड की कहानी
उत्तर प्रदेश: शिकोहाबाद में एक परिवार की नाश वाली कहानी
UP - शनिवार की रात करीब 9:30 बजे राकेश यादव के कमरे से गोलियां चलने लगीं और बेटियों की चीख-पुकार उस घटना के बाद व्यापक रूप से गूंजी। इस घटना ने न केवल दो जिंदगियों को खत्म कर दिया, बल्कि एक खुशहाल परिवार की चर्म गर्मी भी अचानक से बर्बाद हो गई। राकेश यादव की बड़ी बेटी गरिमा रो-रोकर कहती रहीं कि पिता के दिल में शिकोहाबाद की कोठी और संपत्तियों के साथ इतना शोक आ गया था कि उन्होंने बेटियों की बातचीत के बारे में जानकारी नहीं ली थी।
विधिक लड़ाई और परिवार के भंग
गरिमा ने बताया कि राकेश यादव कोर्ट की तारीख से लौटे शनिवार शाम को बेहद गुमसुम रहे थे। उन्होंने खाना नहीं खाया और मुकदमे के बाद से अपने पैतृक गांव डाहिनी को छोड़ दिया था। इस घटना के कारण परिवार में तेज विवाद शुरू हो गए, जिसमें बेटियों की चीख आखिरी बातचीत के रूप में विशेष रूप से सुनामी गई।
परिवार में गरिमा यादव और उनकी ससुराल सिरसागंज में रहती हैं। उनके पति एक प्रतिष्ठित डॉक्टर हैं। वहीं, प्रतिमा यादव शिक्षा विभाग में सरकारी शिक्षक हैं और वर्तमान में कुटुकपुर बरियार मऊ के स्कूल में कार्यरत हैं। उनके पति विवेक यादव भी शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हैं।
मैंने पापा को बहुत समझाया था... वो मुकदमे और बदनामी से इस कदर टूट चुके थे कि उनका दिल शिकोहाबाद में नहीं लग रहा था। मैंने उनसे यहां तक कह दिया था कि पापा, आप परेशान मत हो, हम इस कोठी और संपत्तियों को बेच देंगे और देश छोड़कर नेपाल बस जाएंगे। वहां हमें कोई नहीं जानेगा, कोई ताना नहीं मारेगा।
राकेश यादव की गुहार लगाने वाली बेटी की वजह से वह अपनी संपत्तियों को बेचने के लिए उतसुक रहे। उनके नाना भारत सिंह यादव रोहिला जिले के रहने वाले थे। वह पुलिस में सिपाही बनकर शुरू किया था और बाद में आईजी तक पहुंच गए। राष्ट्रपति पदक भी पाए थे।
राकेश यादव के पिता जगदीश सिंह यादव ने दो शादियां की थीं। उनकी पहली पत्नी के बेटे डॉ. महेश यादव बरेली में वैज्ञानिक हैं। दूसरी शादी के बाद राकेश जनता दल के टिकट पर दो बार विधानसभा चुनाव लड़े। हालांकि, बाद में उन्होंने राजनीतिक राजनीति से थोड़ी दूरी बना ली और कॉलेज प्रबंधन में व्यस्त रहे।
शनिवार की रात जब राकेश यादव के कमरे में गोलियां चलीं तो उनकी सगी बहन सुमन यादव और भांजा गौरव वहां से बराबर के मकान से चले आए। लेकिन तब तक सब कुछ खत्म हो चुका था। राकेश यादव दम तोड़ चुके थे।