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यूपी में सीट बंटवारे पर फंसेगा पेच: कांग्रेस ने चिन्हित की ये 150 सीटें, सपा को ओवैसी-चंद्रशेखर की भी चिंता

Published सितम्बर 27, 2026 · Updated सितम्बर 27, 2026 · By Michael Martin - indianewslive247.com

Foto : Michael Martin - indianewslive247.com

यूपी में सीट बंटवारे पर कांग्रेस-सपा के बीच बढ़ेगा दबाव

Indianewslive247.com – य प म स ट ब टव - यूपी में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बातचीत चुनौतीपूर्ण हो सकती है। कांग्रेस ने करीब 150 विधानसभा सीटों को अपनी दावेदारी के लिए चिन्हित किया है। पार्टी का मानना है कि इन क्षेत्रों में उसके सामाजिक समर्थन और सपा के वोट आधार का मेल विपक्षी गठबंधन को मजबूती दे सकता है।

कांग्रेस की शुरुआती मांग 150 सीटों की बताई जा रही है, हालांकि अंतिम बातचीत में वह करीब 100 सीटों के लक्ष्य पर भी विचार कर सकती है। इससे कम सीटों पर सहमति बनाना कांग्रेस के लिए कठिन हो सकता है। सीटों की संख्या दोनों दलों के चुनावी प्रभाव और गठबंधन में उनकी भूमिका से भी जुड़ी है।

कांग्रेस की नजर सामाजिक समीकरणों वाली सीटों पर

कांग्रेस ने जिन सीटों को अहम माना है, वहां मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण मतदाताओं की प्रभावी मौजूदगी को ध्यान में रखा गया है। पार्टी का आकलन है कि सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों के कारण वंचित तबकों और मुस्लिम समुदाय के बीच उसकी पहुंच बढ़ी है। साथ ही वह ब्राह्मण समाज में अपनी पुरानी राजनीतिक पहचान को फिर मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

पार्टी चाहती है कि गठबंधन में उसे केवल सहयोगी दल की सीमित भूमिका में न देखा जाए। जिन क्षेत्रों में उसका पारंपरिक समर्थन या सक्रिय संगठन मौजूद है, वहां वह उम्मीदवार उतारने के लिए पर्याप्त अवसर मांग सकती है। स्थानीय नेताओं की दावेदारी और बूथ स्तर की तैयारी भी इस मांग के पीछे महत्वपूर्ण कारण होंगे।

लोकसभा चुनाव के नतीजे बनेंगे बातचीत का आधार

यूपी में सीट बंटवारे की चर्चा में पिछले लोकसभा चुनावों के परिणाम दोनों दलों के लिए अहम तर्क बनेंगे। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव लड़ा था और उसे पांच सीटें मिली थीं। वर्ष 2024 में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद सपा ने 37 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की।

कांग्रेस भी अपने पुराने प्रदर्शन का उल्लेख कर सकती है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 21 सीटें जीती थीं। वहीं, 2019 में अकेले चुनाव लड़ने पर उसे केवल एक सीट मिली थी। ये नतीजे बताते हैं कि राज्य में विपक्षी दलों के लिए चुनावी तालमेल महत्वपूर्ण हो सकता है।

सपा को कांग्रेस की ताकत का अंदाजा है।

कांग्रेस और सपा के लिए गठबंधन का उद्देश्य केवल सीटों का हिसाब तय करना नहीं होगा। दोनों दल मानते हैं कि साझा रणनीति से विपक्षी मतों का बिखराव कम किया जा सकता है। कई निर्वाचन क्षेत्रों में वोटों की एकजुटता परिणाम को प्रभावित कर सकती है।

ओवैसी और चंद्रशेखर की संभावित भूमिका पर नजर

गठबंधन की बातचीत में मुस्लिम और दलित वोटों के संभावित बंटवारे की चिंता भी शामिल है। असदुद्दीन ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद के साथ अन्य दलों की संभावित चुनावी गतिविधियां कई सीटों के समीकरण बदल सकती हैं। यदि समान सामाजिक समूहों के मतों के लिए कई दल मैदान में उतरते हैं, तो मुकाबले अधिक जटिल हो सकते हैं।

समाजवादी पार्टी के सामने अपने मूल वोट आधार को बनाए रखने के साथ नए मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की चुनौती होगी। कांग्रेस के साथ तालमेल मुस्लिम मतों के संभावित विभाजन को रोकने का एक विकल्प हो सकता है। दूसरी तरफ, कांग्रेस के लिए पर्याप्त सीटें पाना संगठन और समर्थकों के बीच अपनी राजनीतिक भूमिका मजबूत करने के लिए जरूरी रहेगा।

किन मुद्दों पर अटक सकती है सहमति?

सीटों का फैसला केवल कुल संख्या के आधार पर नहीं होगा। दोनों दल उन क्षेत्रों पर अधिक दावा कर सकते हैं जहां उनका संगठन मजबूत है, पिछला प्रदर्शन बेहतर रहा है या सामाजिक समीकरण अनुकूल हैं। उम्मीदवार की स्वीकार्यता, स्थानीय नेताओं की महत्वाकांक्षा और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा भी बातचीत को प्रभावित कर सकती है।

कांग्रेस की 150 सीटों की सूची उसकी शुरुआती राजनीतिक मांग मानी जा रही है, जबकि करीब 100 सीटों का आंकड़ा व्यावहारिक समझौते की सीमा हो सकता है। सपा अपने संगठनात्मक विस्तार और चुनावी प्रभाव के आधार पर अधिक सीटें अपने पास रखना चाहेगी। इसी अंतर के कारण दोनों पक्षों के बीच लंबी चर्चा की संभावना है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कांग्रेस कितनी सीटों की मांग कर सकती है?

कांग्रेस ने करीब 150 सीटों को चिन्हित किया है, लेकिन अंतिम बातचीत में करीब 100 सीटों पर सहमति की संभावना पर भी विचार हो सकता है।

सीट बंटवारे में मुख्य विवाद क्या हो सकता है?

विवाद उन सीटों को लेकर हो सकता है जहां दोनों दल अपनी संगठनात्मक ताकत, पुराने प्रदर्शन या सामाजिक समीकरण के आधार पर दावेदारी पेश करेंगे।

ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद का असर क्यों महत्वपूर्ण है?

उनकी संभावित चुनावी गतिविधियों से मुस्लिम और दलित मतों का बंटवारा प्रभावित हो सकता है, जिसका असर करीबी मुकाबलों वाली सीटों पर पड़ सकता है।

समय पर सहमति बनने पर कांग्रेस और सपा उम्मीदवार चयन, प्रचार तथा बूथ प्रबंधन पर ध्यान दे सकेंगी। लेकिन बातचीत लंबी खिंचने पर स्थानीय स्तर पर असंतोष और भ्रम बढ़ने की आशंका रहेगी।

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