आईडीबीआई बैंक विनिवेश पर उठे सवाल: वित्त मंत्रालय ने हाईकोर्ट के फैसले का दिया हवाला, कहा- कानून में रोक नहीं
आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश पर वित्त मंत्रालय का कानूनी स्पष्टीकरण
Indianewslive247.com – आईड ब आई ब क व न - आईडीबीआई बैंक में सरकार की हिस्सेदारी घटाने और बैंक के रणनीतिक पुनर्गठन को लेकर उठी कानूनी बहस के बीच वित्त मंत्रालय ने स्थिति स्पष्ट की है। मंत्रालय का कहना है कि आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम, 2003 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो केंद्र सरकार को बैंक में अपनी हिस्सेदारी कम करने अथवा पूरी तरह बेचने से रोकता हो।
यह स्पष्टीकरण उस समय सामने आया है जब आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति, यानी सीसीईए, ने आईडीबीआई बैंक लिमिटेड के रणनीतिक पुनर्गठन को मंजूरी दे दी है। निर्णय के तहत बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की एक सहायक कंपनी को 52,878.08 करोड़ रुपये में बेचने का प्रस्ताव है।
2003 के कानून में संशोधन का प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ था
वित्त मंत्रालय ने संसदीय इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि 2003 में आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम पर चर्चा के दौरान सरकार की हिस्सेदारी में कटौती सीमित करने वाला एक संशोधन प्रस्तावित हुआ था। हालांकि, संसद ने उस संशोधन को मंजूरी नहीं दी। परिणामस्वरूप, हिस्सेदारी घटाने पर किसी प्रकार की पाबंदी अंतिम कानून का हिस्सा नहीं बनी।
मंत्रालय के स्पष्टीकरण का केंद्रीय बिंदु यही है कि संसदीय बहस में व्यक्त विचार और विधिवत पारित कानून अलग-अलग चीजें हैं। किसी प्रस्ताव या चर्चा को तब तक कानूनी बाध्यता नहीं माना जा सकता, जब तक उसे कानून के प्रावधान के रूप में स्वीकार न कर लिया जाए।
दिल्ली हाईकोर्ट के 2018 के फैसले का उल्लेख
मंत्रालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के 17 दिसंबर 2018 के निर्णय का भी हवाला दिया। यह फैसला ऑल इंडिया आईडीबीआई ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में आया था। अदालत ने कर्मचारियों के संगठन की याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें सरकार की हिस्सेदारी घटाने के कदम पर आपत्ति जताई गई थी।
अदालत ने अपने निर्णय के पैराग्राफ 41 में स्पष्ट किया था कि संसद के भीतर दिए गए वक्तव्य अपने-आप कानून का रूप नहीं ले सकते।
“सदन के समक्ष दिए गए बयान संसद द्वारा बनाए गए कानून का स्थान नहीं ले सकते और न ही उसे बदल सकते हैं।”
इस टिप्पणी का अर्थ यह है कि बहस के दौरान सरकार की ओर से कही गई बातों के आधार पर अधिनियम के शब्दों में नया प्रतिबंध नहीं जोड़ा जा सकता। वित्त मंत्रालय ने कहा कि अदालत ने इस पहलू पर स्पष्ट कानूनी दृष्टिकोण अपनाया था।
प्रॉमिसरी एस्टॉपल का तर्क क्यों स्वीकार नहीं हुआ
याचिका में प्रॉमिसरी एस्टॉपल के सिद्धांत का भी सहारा लिया गया था। सामान्य रूप से इस सिद्धांत का आशय यह होता है कि यदि किसी पक्ष ने भरोसेमंद आश्वासन देकर दूसरे पक्ष को उसके आधार पर कदम उठाने के लिए प्रेरित किया हो, तो वह बाद में अपने वचन से पीछे नहीं हट सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि आईडीबीआई बैंक के मामले में यह सिद्धांत लागू नहीं होता। अदालत के अनुसार, संसदीय चर्चा में दिए गए कथनों को कर्मचारियों के लिए ऐसा विशेष आश्वासन नहीं माना जा सकता, जिसके भरोसे उन्होंने कोई निर्णय लिया हो और बाद में उन्हें नुकसान उठाना पड़ा हो। इसलिए सरकार को हिस्सेदारी घटाने से रोकने के लिए इस कानूनी आधार का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कानून की भाषा को लेकर अदालत का निष्कर्ष
वित्त मंत्रालय ने फैसले के पैराग्राफ 42 का विशेष रूप से जिक्र किया। अदालत ने कहा था कि आईडीबीआई निरसन अधिनियम, 2003 की भाषा स्पष्ट है और उसमें ऐसी कोई रोक नहीं पढ़ी जा सकती जो सरकार को आईडीबीआई लिमिटेड में अपना हिस्सा कम करने या बैंक से बाहर निकलने से प्रतिबंधित करे।
“आईडीबीआई निरसन अधिनियम, 2003 की भाषा में कोई अस्पष्टता नहीं है। इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान जोड़कर पढ़ने की गुंजाइश नहीं है, जो सरकार को आईडीबीआई लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी घटाने या उससे पूरी तरह बाहर निकलने से रोकता हो।”
इस निष्कर्ष के बाद सरकार का तर्क है कि प्रस्तावित रणनीतिक विनिवेश के रास्ते में 2003 का कानून कानूनी अवरोध नहीं बनता। हिस्सेदारी बिक्री, स्वामित्व में बदलाव और बैंक के पुनर्गठन से जुड़े आगे के कदमों का मूल्यांकन अब स्वीकृत प्रक्रिया और लागू नियमों के अनुरूप किया जाएगा।
बजट भाषणों में भी नीति परिवर्तन के संकेत
मंत्रालय ने केवल कानून और अदालती निर्णय का ही उल्लेख नहीं किया, बल्कि अलग-अलग वर्षों के केंद्रीय बजट भाषणों को भी नीति के क्रमिक विकास के प्रमाण के रूप में रखा। वित्त वर्ष 2016-17 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि आईडीबीआई बैंक में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार बैंक में अपनी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से नीचे ले जाने के विकल्प पर विचार करेगी।
बाद के वर्षों में भी रणनीतिक विनिवेश को सरकार की व्यापक नीति के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया गया। वित्त वर्ष 2021-22 का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि कोविड-19 की चुनौतियों के बावजूद रणनीतिक विनिवेश की दिशा में काम जारी रहा। उन्होंने बीपीसीएल, एयर इंडिया, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, बीईएमएल, पवन हंस और नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड सहित कई प्रस्तावित सौदों का उल्लेख किया था।
“कोविड-19 के बावजूद हमने रणनीतिक विनिवेश की दिशा में काम जारी रखा है।”
सीतारमण ने उस बजट भाषण में आईडीबीआई बैंक के अतिरिक्त दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव भी रखा था। उन्होंने कहा था कि उन प्रस्तावों के लिए विधायी बदलावों की जरूरत होगी और उन्हें उसी सत्र में पेश करने की योजना थी।
सरकार के पक्ष में तीन आधार
वित्त मंत्रालय के स्पष्टीकरण में आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश के समर्थन में तीन प्रमुख आधार उभरते हैं—2003 के कानून का विधायी इतिहास, दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय और लगातार बजट भाषणों में व्यक्त नीति दिशा। मंत्रालय का कहना है कि इन तीनों को साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि सरकार की हिस्सेदारी कम करने की नीति अचानक लिया गया कदम नहीं है, बल्कि समय के साथ विकसित हुई रणनीति का हिस्सा है।
आईडीबीआई बैंक का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कानूनी व्याख्या, सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं में सरकारी स्वामित्व और रणनीतिक विनिवेश जैसे विषय एक साथ जुड़े हैं। मंत्रालय ने दोहराया है कि मौजूदा कानून सरकार को अपनी हिस्सेदारी कम करने से नहीं रोकता और इस संबंध में हाईकोर्ट का फैसला भी उसी निष्कर्ष की पुष्टि करता है।
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