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आज का शब्द: अनघ और रामधारी सिंह “दिनकर” की कविता- जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे

Published जून 16, 2026 · Updated जून 16, 2026 · By Daniel Davis

आज का शब्द: अनघ और रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविता

आज क शब द - आज का शब्द हमारी हिंदी भाषा में एक विशिष्ट शब्द है, जो निर्दोषता और बलिदान को दर्शाता है। आज का शब्द रामधारी सिंह दिनकर की कविता "जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे" में एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में सामने आता है। इस शब्द का अर्थ अपराधरहित आत्मा या अक्षमता भी हो सकता है, जो बलिदान और जीवन के लक्ष्य के बीच एक दिलचस्प संबंध दर्शाता है। आज का शब्द कविता के आकाशीय उद्देश्य के साथ संबद्ध है, जिसकी शुरुआत में हम इसकी गहरी छाप को आकर्षित करते हैं।

कविता के विषय और भाव

वैराग्य को छोड़ आपकी बाँहों की विभा धारण करो, चट्टानों की छाती से दूध निकालो। है रुकी जहाँ भी धार, शिलाएँ तोड़ो, पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो। चढ़ तुँग शैल शिखरों पर सोम पियो रे! योगियों के सदृश नहीं, विजयी जियो रे! जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है, चिनगी बन फूलों का पराग जलता है। सौन्दर्य बोध बन नई आग जलता है, ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है। अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे! गरजे कृशानु तब कँचन शुद्ध करो रे! जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है, भामिनी वही तरुणी, नर वही तरुण है। है वही प्रेम जिसकी तरँग उच्छल है, वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है। उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है, तलवार प्रेम से और तेज होती है! छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए, मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाए। दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है, मरता है जो एक ही बार मरता है। तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे! जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे!

इस कविता में आज का शब्द 'अनघ' के माध्यम से एक गहरी छाप छोड़ते हुए, लेखक ने जीवन के लक्ष्य की ओर ध्यान आकर्षित किया है। आज का शब्द न केवल बलिदान बल्कि धर्म और साहस के विषय में भी बोध ले रहा है। इस कविता के तीन श्लोक जीवन के चरम पर चलने की अपील करते हैं, जहाँ विभा और अरुण के मिश्रण से नया आत्मा जन्मता है। आज का शब्द कविता में अंततः उद्दाम प्रीति के बारे में बात करते हैं, जो जीवन के लिए अमृत की तरह लगती है।

रामधारी सिंह दिनकर और कविता का अर्थ

रामधारी सिंह दिनकर एक प्रसिद्ध भारतीय कवि हैं, जिन्होंने हिंदी के रूप और अर्थ को गहराई से समझा है। उनकी कविता "जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे" में, आज का शब्द के माध्यम से जीवन के लिए एक नया उद्देश