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दूसरा सावन सोमवार आज: शिप्रा कुंडों के समीप 12-13 वीं सदी में बना था केवड़ेश्वर का सिद्ध शिव मंदिर

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Foto : Charles Davis - indianewslive247.com
Table of Contents
  1. दूसरा सावन सोमवार: केवड़ेश्वर का प्राचीन सिद्ध शिव मंदिर
  2. Related Reading
  3. Frequently Asked Questions

दूसरा सावन सोमवार: केवड़ेश्वर का प्राचीन सिद्ध शिव मंदिर

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मंदिर का परिचय

Indianewslive247.com – द सर स वन स मव र – दूसरा सावन सोमवार विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इंदौर के निकट स्थित केवड़ेश्वर महाकाल शिव मंदिर इस अवसर पर श्रद्धालुओं का आकर्षण केंद्र बनता है। यह प्राचीन धाम लगभग 12-13वीं सदी में निर्मित हुआ था और शिप्रा कुंडों के समीप विराजमान है। इतिहासकारों के अनुसार लगभग आठ सौ साल पहले इसका निर्माण हुआ था। इंदौर शहर से यह स्थान करीब बीस किलोमीटर की दूरी पर तिल्लौर खुर्द गाँव के पास स्थित है।

यह धाम पुण्य सलिला मोक्षदायनी शिप्रा नदी के उद्गम स्थल के रूप में भी जाना जाता है। हालाँकि शिप्रा का वास्तविक उद्गम विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के कोकरी बड़ली पहाड़ी पर है। महंतों और संतों का मानना है कि केवडेश्वर मंदिर के पास ही गुप्त रूप से शिप्रा का निवास है। जीर्णोद्धार के बाद ये तीन कुंड नवीन प्रतीत होते हैं। शिव मंदिर इन कुंडों के उत्तर पूर्वाभिमुख दिशा में स्थित है।

केवड़ेश्वर मंदिर का निर्माण 12-13वीं सदी में हुआ था और यह शिप्रा कुंडों के समीप स्थित है।

नामकरण और वास्तुकला

केवड़े के पेड़ों की यहाँ बहुतायत के कारण केवड़ेश्वर शिव मंदिर का नामकरण हुआ है। समीप के कुछ लोग निवास करने लगे हैं। होलकर कालीन इतिहास की किताबों में तिल्लौर खुर्द ग्राम का उल्लेख मिलता है। 1931 में प्रकाशित कैप्टन एल. सी. धारीवाल के इंदौर जिला गजेटियर में तिल्लौर खुर्द की 1921 में आबादी 716 दर्ज है।

मान्यता है कि किसी कालखंड में इस स्थान पर केवड़े के पेड़ बहुत अधिक संख्या में रहे थे। केवड़े के पेड़ में जो फूल लगता है उसे केवड़ा कहते हैं, यह बहुत सुगंधित होता है। मंदिर का जीर्णोद्धार होलकर राजाओं ने करवाया था। मंदिर की संरचना, गर्भगृह, और द्वार परमार कालीन हैं।

धार्मिक महत्व और देवता

स्वयंभू है शिवलिंग केवड़ेश्वर शिव मंदिर का लिंग स्वयं प्रकट हुआ है, इसलिए यह मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर प्रागण में शिव प्रतिमाएं और नंदी की प्रतिमा विराजित है। मंदिर में गणेश जी की प्रतिमा दीवार पर मुद्रित है। समीप ही सुंदर घाटों का निर्माण किया गया है।

मंदिर के पीछे की भाग में महात्माओं की समाधि, निवास, गुफाएं और महंतों के रहने का स्थान है। मंदिर प्रागण में विशाल वृक्षों की श्रृंखला भी है, जिन्हें देख लगता है कि ये पेड़ बहुत अधिक प्राचीन रहे होंगे। दूधाधारी महाराज की तपोस्थली मंदिर के आसपास विशाल और घने वृक्ष है।

धार्मिक व्यक्तित्व और वर्तमान प्रबंधन

वर्तमान में मंदिर का दायित्व धर्मेंद्रपुरी महाराज संभाल रहे हैं। उनके अनुसार केवड़ेश्वर महाकाल मंदिर बाबा दूधाधारी महाराज की तपोस्थली है। इसी स्थान पर बाबा घने जंगल में साधना करते थे। घने जंगल की वजह से मंदिर में कई जंगली जानवरों का भय रहता था, पर वे भी देव दर्शन कर चले जाते थे।

इस स्थान पर अखंड चैतन्य धुनी कई वर्षों से प्रज्वलित है। यहां बाबा त्र्यंबक पुरी महाराज ने 108 वर्ष तक तपस्या की थी। घने पेड़ और आसपास सुंदर मनोरम स्थल होने से यहां कई लोग दर्शन हेतु आते हैं।

समीप के अन्य धार्मिक स्थल

केवड़ेश्वर महाकाल शिव मंदिर से कुछ दूरी पर कंपेल है। यह होलकर राजाओं का आरंभिक जिला मुख्यालय था। यहां देवी अहिल्या बाई की कचहरी थी। केवड़ेश्वर जाने वाले मुख्य मार्ग पर पहले देवगुराड़िया का गुटकेश्वर महादेव आता है। इस शिव मंदिर का जीर्णोद्धार देवी अहिल्या बाई ने करवाया था।

देवगुराड़िया और कंपेल के बीच में केवड़ेश्वर महाकाल मंदिर स्थित है। सावन माह और विशेष अवसरों पर इन दोनों मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

केवड़ेश्वर मंदिर कब निर्मित हुआ था? केवड़ेश्वर मंदिर का निर्माण 12-13वीं सदी में हुआ था और यह शिप्रा कुंडों के समीप स्थित है।

दूसरा सावन सोमवार को मंदिर में विशेष पूजा होती है? हाँ, दूसरा सावन सोमवार को श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में भीड़ होती है और विशेष पूजा-पाठ का आयोजन किया जाता है।

मंदिर इंदौर से कितनी दूर है? केवड़ेश्वर मंदिर इंदौर शहर से करीब बीस किलोमीटर की दूरी पर तिल्लौर खुर्द गाँव के पास स्थित है।

शिप्रा नदी का उद्गम स्थल कहाँ है? शिप्रा नदी का वास्तविक उद्गम विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के कोकरी बड़ली पहाड़ी पर है, हालाँकि केवड़ेश्वर मंदिर के पास भी शिप्रा का निवास माना जाता है।

Frequently Asked Questions

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